Accused acquitted in five-year-old NDPS case, court makes strong remarks on contradictions in police testimony

पांच साल पुराने एनडीपीएस मामले में आरोपी बरी, पुलिस गवाही में विरोधाभास पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

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Accused acquitted in five-year-old NDPS case, court makes strong remarks on contradictions in police

 

चंडीगढ़। जिला अदालत ने करीब पांच वर्ष पुराने एनडीपीएस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी राजेश कुमार उर्फ काला उर्फ बाबा को बरी कर दिया। स्पेशल कोर्ट ने माना कि पुलिस अधिकारियों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं तथा केस प्रॉपर्टी की सुरक्षा और कस्टडी को लेकर संदेह उत्पन्न होता है। ऐसे में आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना न्यायोचित है।

यह मामला थाना सेक्टर-11 में 9 जनवरी 2020 को दर्ज एफआईआर से संबंधित था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उसी दिन शाम लगभग 7:15 बजे सेक्टर-25/38 के लाइट प्वाइंट के पास आरोपी को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने दावा किया था कि उसके कब्जे से 10.70 ग्राम हेरोइन तथा 2-2 एमएल के 14 बुप्रेनॉरफिन इंजेक्शन बरामद किए गए थे। आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 21 और 22 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

केस प्रॉपर्टी की कस्टडी पर उठे सवाल

ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष की जिरह में एक अहम गवाह तथा जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि केस प्रॉपर्टी को खोला गया था। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि इस तथ्य का उल्लेख न तो उनके प्रारंभिक बयान में था, न चार्जशीट में और न ही धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान में।

अदालत ने टिप्पणी की कि जब केस प्रॉपर्टी की सील और उसकी सुरक्षित कस्टडी के संबंध में स्पष्ट व सुसंगत बयान नहीं हैं, तो संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इससे संपूर्ण जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

स्थानीय गवाहों को नहीं जोड़ा गया

बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि घटना वाले दिन दोपहर करीब 2 बजे आरोपी को इलाके से उठाया गया था। इस संबंध में कई स्थानीय निवासियों के बयान दर्ज किए गए थे, लेकिन उन्हें न तो चार्जशीट का हिस्सा बनाया गया और न ही अदालत की अनुमति लेकर उन्हें बाहर रखा गया।

रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद की गई जांच में दर्ज बयानों को अंतिम रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया।

पुलिस गवाही में तालमेल की कमी

अदालत ने पाया कि पुलिस अधिकारियों के बयानों में कई बिंदुओं पर आपसी सामंजस्य नहीं है। एक अधिकारी ने केस प्रॉपर्टी खोले जाने की बात स्वीकार की, जबकि प्रारंभिक रिकॉर्ड में इसका कोई उल्लेख नहीं था। इससे अभियोजन पक्ष की कहानी पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ।

बचाव पक्ष के अधिवक्ता तरमिंदर सिंह, मधु वाणी और मनजिंदर सिंह ने दलील दी कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है तथा जांच में गंभीर खामियां हैं।

स्पेशल कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। गवाहों के बयानों, केस प्रॉपर्टी की हैंडलिंग और जांच में पाई गई कमियों को देखते हुए आरोपी को बरी किया जाता है।